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    आखिर क्या है खालिस्तान और खालिस्तानियों का सच

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    आशिषा सिंह राजपूत, नई दिल्ली

    खालिस अर्थ होता है “शुद्ध” अर्थात जिसमें किसी भी तरह की कोई भी मिलावट ना हो। भाषा के आधार पर पंजाबी भाषी लोगों अलग दिखाकर उनके लिए एक अलग राज्य की मांग की शुरुआत पंजाबी सूबा आंदोलन से हुई थी। इस मांग को लेकर जबरदस्त प्रदर्शन हुए और अंततः 1966 में ये मांग मान ली गई और भाषा के आधार पर पंजाब, हरियाणा और केंद्र शाषित प्रदेश चंडीगढ़ की स्थापना कर दी गई।

    फिर 1980 के दशक में स्वायत्त राज्य की मांग को लेकर ‘खालिस्तान’ ने तूल पकड़ा। और देखते ही देखते यह मांग ‘खालिस्तान आंदोलन’ में परिवर्तित हो गई। वहीं सिख धर्म में कट्टरता का समर्थक और ‘दमदमी टकसाल’ के जरनैल सिंह भिंडरावाला की लोकप्रियता बढ़ने लगी। कट्टरवादी भिंडरावाले ने पूरे पंजाब में अपनी जड़ बना ली जिससे आंदोलन हिंसक होता गया और अराजकता का दौर शुरू हुआ। 1980-1984 के बीच पंजाब में कई आतंकी हिंसाओं हुई। और 1983 में सिखों के पाक स्थल स्वर्ण मंदिर में डीआईजी अटवाल की हत्या कर दी गई। और 1983 में भिंडरावाला ने स्वर्ण मंदिर को अपना गढ़ बना लिया। तमाम सुरक्षा के बीच अनेकों हथियारों से खुद को लैस कर के उसने धीरे-धीरे हथियारों का जखीरा स्वर्ण मंदिर में एकत्रित करने लगा।

    शुरू हुआ कट्टरवादी विचारधारा ‘खालिस्तान आंदोलन’

    इंदिरा गांधी की सरकार में यह मुद्दा आए दिन बढ़ता जा रहा था और सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया। भिंडरवाला को स्वर्ण मंदिर से निकालने के लिए पुरजोर कोशिश की गई। आम जनता की भी इसमें शामिल होने की वजह से बहुत से ऑपरेशन बनाए और नकारे गए। लेकिन अंततः इंडियन आर्मी द्वारा ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ हुआ। और 1-3 जून 1984 के बीच पंजाब की रेल, रोड और एयर ट्रांसपोर्ट सर्विस को रोक दिया गया. स्वर्ण मंदिर में पानी और बिजली की सप्लाई काट दी गई। स्वर्ण मंदिर के अंदर 6 जून 1984 को इंडियन आर्मी द्वारा चलाए गए अभियान में खूब गोलाबारी हुई। जिसमें जरनैल सिंह भिंडरवाला का शव बरामद कर लिया। और 7 जून 1984 में मिलिट्री ने स्वर्ण मंदिर को अपने कंट्रोल में ले लिया।

    इस ऑपरेशन का नकारात्मक प्रभाव इंदिरा गांधी की सरकार पर पड़ा और सिख समुदाय के लोगों का गुस्सा फुटकर बरसा। कैप्टन अमरिंदर सिंह समेत कई सिख नेताओं ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। खुशवंत सिंह समेत कई लेखकों ने अपने अवॉर्ड वापस कर दिए। बात इतने पर ही नहीं रुकी बल्कि 4 महीनों बाद ही 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही 2 सिख सुरक्षाकर्मियों ने कर दी। इसके बाद हवाई जहाज हाईजैक किए गए, आतंकी हमले हुए और कट्टरवाद ताकि पराकाष्ठा पार करते हुए इन सबको भिंडरवाला की मौत का बदला बताया। 10 अगस्त 1986 को पूर्व आर्मी चीफ जनरल एएस वैद्य की हत्या कर दी गई और 31 अगस्‍त 1995 को पंजाब सिविल सचिवालय के पास हुए बम विस्फोट में पंजाब के तत्कालीन सीएम बेअंत सिंह इन सब की जिम्मेवारी खाली स्थान संगठन ने ली। यहीं से कट्टरवादी विचारधारा और हिंसक संगठन ‘खालिस्तान आंदोलन’ की शुरुआत हुई।

    खालिस्तान का वर्तमान परिदृश्य

    हाल में चल रहे कृषि कानूनों को लेकर केंद्र सरकार और किसानों के बीच मतभेद और प्रदर्शन आए दिन उग्र और बढ़ता जा रहा है। जहां केंद्र सरकार की किसानों को मनाने की हर कोशिश नाकामयाब साबित हो रही है। वहीं किसानों का उग्रवादी प्रदर्शन देखकर या अटकलें लगाई जा रही हैं कि देश के किसानों को भड़काने में कहीं खालिस्तानी आतंकी तो शामिल नहीं। हरियाणा के कैथल के भाजपा विधायक लीलाराम ने एक बेबाक और विवादित बयान देते हुए कहा दिया कि “दिल्ली में किसान नहीं… खालिस्तान और पाकिस्तान जिंदाबाद वाले लोग बैठे हैं, जिन्होंने इंदिरा गांधी को ठोक दिया, मोदी को ठोक देंगे.” हालांकि बयान भले ही विवादित हो लेकिन सभी इससे सकते में आ गए हैं। वही किसानों द्वारा कहा जा रहा है कि ऐसा कुछ भी नहीं है आंदोलनकारी और प्रदर्शनकारी सिर्फ किसान हैं लोगों को भ्रमित करने के लिए यह बात कहीं जा रही है।

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