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    AIIMS छात्रों की चयन प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट की अवमानना कर रहा है

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    आशिषा सिंह राजपूत, नई दिल्ली

    अखिल भारत आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) भारत का सबसे बेहतर और उत्कृष्ट चिकित्सा संस्थान है। मेडिकल की परीक्षा की तैयारी कर रहे हर एक छात्र का सपना AIIMS में दाखिला लेने का होता है। एम्स की एक सीट पाने के लिए छात्रों में कड़ी प्रतिस्पर्धा तो होती ही है, लेकिन उसके अलावा इसमें रैंक पाकर भी आरक्षण की वजह से सीट की उलट पुलत से बहुत से छात्र अपनी काबिलियत और मनपसंद अनुसार कॉलेज से वंचित रह जाते हैं।

    यह कहां का इंसाफ है की अपनी काबिलियत और अपने ज्ञान के बल पर परीक्षा में सबसे ज्यादा नंबर पाकर, अच्छी रैंक पर अपना नाम करवा कर भी बहुत से छात्र अपने सामान्य श्रेणी में होने की वजह से उन कॉलेजों से वंचित रह जाते हैं। जिन कॉलेजों में जाना उनका हक होते हुए भी व जाति के आधार पर छात्रों को आरक्षण की मार सहनी पड़ती है।

    AIR-2 दीक्षा सिंह

    इसका प्रमाण हाल ही में आयोजित INI-CET (MDS) में, जो AIIMS PG (MDS) पाठ्यक्रम में दीक्षा सिंह को प्रवेश मिला। दीक्षा सिंह ने अपनी काबिलियत के दम पर AIR-2 रैंक अपने नाम किया, जो आवश्यक भी था क्योंकि केवल UR छात्रों के लिए 2 सीटें थीं। एम्स दिल्ली इस साल कुल 12 सीटों में से (20% भी नहीं) रोस्टर आधारित सीट रिक्ति प्रणाली का पालन करते हैं।

    दीक्षा सिंह एम्स दिल्ली में यूआर की दूसरी सीट प्राप्त करके भी दुर्भाग्य से उन्हें एम्स ऋषिकेश आवंटित किया गया है. जो काउंसलिंग में उनकी सबसे कम पसंदीदा प्राथमिकता थी, जबकि उनकी सीट एक यूआर (PWBD) उम्मीदवार को आवंटित की गई है। यह सब एक तथ्य से यही उभरकर सामने आता है, कि अब यह सामान्य श्रेणी के बच्चों के लिए आरक्षण अभिशाप बनता जा रहा है और वह भी बिना डब्ल्यूडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र के।

    यहां तक ​​कि AIR-1 को अपनी पसंद की एक शाखा नहीं मिली है क्योंकि यह UR श्रेणी के लिए उपलब्ध नहीं है और AIR-4 (UR) को सभी AIIMS के बीच कुल 15 सीटों में से एक सीट भी नहीं मिली है। यह सिर्फ इक्का-दुक्का उदाहरण नहीं है, बल्कि लाखों छात्रों को अपनी काबिलियत और हक का समझौता आरक्षण से करना पड़ रहा है।

    सुप्रीम कोर्ट की अवमानना कर रहा अखिल भारत आयुर्विज्ञान संस्थान

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि शीर्ष श्रेणी के उम्मीदवारों को आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार जो सामान्य श्रेणी के तहत सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार की तुलना में अधिक अंक प्राप्त करते हैं व खुली श्रेणी सभी के लिए खुली है, और इसमें किसी उम्मीदवार के लिए केवल एक ही शर्त है कि वह किसी भी प्रकार का आरक्षण लाभ उपलब्ध है या नहीं, यह छात्रों की योग्यता है। साथ ही साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा की मेधावी उम्मीदवार को प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति उदय ललित ने कहा कि अनुमन्य कोटा लाभों के अधीन, सीटों को भरने की किसी भी विधि को योग्यता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और मेधावी उम्मीदवारों की सहायता करनी चाहिए, चाहे उनकी श्रेणियां और जाति कुछ भी हो।

    इसमें कहा गया है कि खुली श्रेणी में प्रतियोगिता पूरी तरह से योग्यता के आधार पर होनी चाहिए।
    इसके बावजूद अखिल भारत आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करते हुए, आरक्षण का राग अलाप रहा है। ऐसा करके एम्स नात शरीफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को नजरअंदाज कर रहा है बल्कि मेधावी और योगिता पूर्ण छात्रों के साथ अन्याय कर रहा है। यह सब एक तथ्य से यही उभरकर सामने आता है, कि अब यह सामान्य श्रेणी के बच्चों के लिए आरक्षण अभिशाप बनता जा रहा है। और वह भी बिना डब्ल्यूडब्ल्यूएस प्रमाणपत्र के।

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