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    क्या बिकने की कगार पर है भारत की सबसे बड़ी शिपिंग कंपनी

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    आशिषा सिंह राजपूत, नई दिल्ली

    स्वतंत्रता के बाद देश को तरक्की की राह पर ले जाने के लिए बहुत सारे महत्वपूर्ण फैसले लिए गए थे। सत्ता शासन में सरकारों को जनहित और देशहित के उद्देश्य से लोगों ने चुना और बनाया। वहीं आम जनता के भरोसे का सम्मान करते हुए सरकार को आम आदमी की मूल जरूरतों का ध्यान रखने, देश को सुचारू रूप से चलाने एवं देश को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसी कड़ी में देश को विकसित और तरक्की की राह पर ले चलने के लिए सरकार के पास बहुत से जिम्मेदारियां भी रहीं, जाहिर है सरकार हर काम नहीं कर सकती जिसके चलते बहुत सी देश की तरक्की से जुड़ी हुई जिम्मेदारियां निजी कंपनियों को सौंपी गई, जिससे देश का सुचारू रूप से विकास हो सके। एलआईसी (LIC), बैंकिंग (Banking), एम्स (Aiims), बीएसएनएल (BSNL), ओएनजीसी (ONGC), भेल (BHEL) एवं बहुत सी संस्थाओं और कंपनियों को सरकारी हाथों में रखा गया वहीं, दूसरी ओर अन्य उद्योगों को टाटा बिरला वह दूसरे उद्योग पतियों के निजी में हाथों में दिया गया।

    देश के विकास में क्या है योगदान

    देश को विकास की ओर ले जाने में सरकार और निजी उद्योगपतियों ने संतुलन बनाकर सदैव कार्य किए। जिसकी वजह से आम जनता तक बिजली, पानी, फोन दुरुस्त सड़कें इत्यादि लोगों को मुहैया हो सकीं। लेकिन इस बात को झूठलाया नहीं जा सकता की निजी उद्योग पतियों के लिए हर चीज़ से ऊपर कुछ है तो वह उनका निजी मुनाफा है। कुछ क्षेत्रों से निजी और विदेशी कंपनियों के दायरे से दूर रखा गया, जिससे देश की सुरक्षा और निजीता को भंग ना किया जा सके। परंतु देश की तरक्की को ध्यान में रखकर बैंकिंग बीमा दूरसंचार व अन्य क्षेत्रों को धीरे धीरे निजी हाथों में सौंपा गया जिससे निजी कंपनियां आपस में प्रतिस्पर्धा करते हुए बेहतर से बेहतर सेवा जन-जन तक पहुंचा सके।

    वहीं जाहिर सी बात है ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश करने से निजी उद्योगों को घाटे का सामना करना पड़ सकता है, जिससे वे ग्रामीण क्षेत्रों से अपने ध्यान व अपना निवेश हटाकर शहरों को चकाचौंध करने में लगाते हैं जिससे कि उनकी भी चांदी हो सके। जबकि संपूर्ण रूप से देश की तरक्की के लिए एक सबसे बड़ा यथार्थ यह है कि शहरों के साथ-साथ गांव और कस्बों को भी विकसित किया जाए।

    शिपिंग कंपनी को 63 फीसदी हिस्सेदार को बेचने का किया गया फैसला

    मोदी सरकार ने बीपीसीएल औऱ एअर इंडिया के बाद शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (SCI) की 63 फीसदी हिस्सेदार को बेचने का फैसला किया है। वित्त मंत्रालय ने 63.75 फीसदी की रणनीतिक हिस्सेदारी में विनिवेश और प्रबंध व नियंत्रण स्थानांतरित करने के लिए बोलियों को आमंत्रित किया है। केंद्र सरकार ने 13 फरवरी तक वित्त मंत्रालय ने 63.75 फीसदी की रणनीतिक हिस्सेदारी में विनिवेश और प्रबंध व नियंत्रण स्थानांतरित करने के लिए बोल कारों को आमंत्रण भेजा है। जानकारों की माने तो एसार शिपिंग, अडानी, वेदांता, जीई शिपिंग औऱ दुबई पोर्ट वर्ल्ड इसमें हिस्सा ले सकती हैं।

    वहीं अनुमान लगाया जा रहा है कि केंद्र सरकार को करीब 2500 करोड़ रुपये मिलेंगे। (SCI) के 2969 लाख शेयर बेचे जाने हैं जिनको बेचने में कोरोना काल की महामारी की वजह से देरी हुई। केंद्र सरकार ने शिपिंग कॉर्पोरेशन के 29.69 करोड़ इक्विटी शेयर बेचने का फैसला किया है जो कि 63.75 फीसदी के ही बराबर हैं। अभी तक कंपनी का मार्केट वैल्युएशन करीब 4000 करोड़ रुपये का है। भारत की सबसे बड़ी शिपिंग कंपनी में इसमें क्रूड ऑइल टैंकर, बड़े क्रूड ऑइल कैरियर, पेट्रोलियम प्रोडक्ट कैरियर, एलपीजी कैरियर, बल्क कैरियर, कंटेनर शिप और ऑफशोर सपोर्ट वेशल शामिल हैं।

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