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    साल 2020 की बड़ी राजनीतिक उठापटक पर एक नज़र

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    आशिषा सिंह राजपूत, नई दिल्ली

    राजस्थान की राजनीति

    साल 2020 में कांग्रेस के खेमे के भीतर इतने द्वंद चले, जिससे कि एक सियासी संग्राम छिड़ गया। जहां कांग्रेस के नेता आपस में ही जबानी जंग करते रहे वहीं विपक्षी दलों ने कांग्रेस की आपसी लड़ाई में अपनी सियासी रोटियां खूब सेकी। सचिन पायलट और अशोक गहलोत राजस्थान की राजनीति में यह दो नाम ऐसे उभरकर सामने आए जिसने आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चला। जहां गहलोत बार बार राज्यपाल से विधायकों के पूर्ण बहुमत समर्थन होने का दावा करते रहे वही सचिन पायलट लगातार विरोध करते हुए कहते रहे कि गहलोत सरकार ने राज्यपाल को समर्थन कर रहे विधायकों की सूचि नहीं दी है, जिनका उनके पास समर्थन है। जहां भाजपा चाहती तो राज्यपाल से विपक्षी होने के तौर पर फ्लोर टेस्ट की मांग सामने रख सकती थी। वहीं यह सब जान के भी अनजान बने रहकर भाजपा ने पूर्ण रूप से पर्दे के पीछे रहकर कांग्रेस की आपसी असमंजस का और सियासी हलचल का चुपचाप नजारा देखती रही।

    बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के एग्जिट पोल

    बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के एग्जिट पोल की बात की जाए रुझानों और अंतिम प्रमाण की उलटफेर में भारी अंतर से खुब उथल- पुथल मची, जहां सर्वे में महागठबंधन को जीतता हुआ दिखाया गया था लेकिन मतगणना शुरू होने के बाद विपरित रुझानों के मिलने से अनुमान गलत साबित होने लगे। शुरुआत में राजद और महागठबंधन, एनडीए से जहां काफी आगे चल रहा था। वहीं मतगणना के मध्य तक एनडीए महागठबंधन से 3 सीट आगे निकल गया। 243 सीटों का आंकड़ा आने के बाद देखे गए रुझानों में एनडीए 119 और महागठबंधन 116 सीटों पर आ गया। वहीं अचानक से बदलता रुझान देखकर राजनीतिज्ञ एग्जिट पोल पर सवाल खड़े करने लग गए। एग्जिट पोल की गड़बड़ी को लेकर उठे सवालों से राजनेताओं और राजनीति दोनों में गर्मा- गर्मी बनी रही।

    महागठबंधन और एनडीए के बीच की जंग

    बिहार के विधानसभा चुनाव 2020 में बहुत सी छोटी बड़ी पार्टियों ने मिलकर गठबंधन बनाकर चुनाव लड़े। यह गठबंधन चुनाव की तारीख आने से पहले और बाद तक बनते रहे। विधानसभा चुनाव में लगातार महागठबंधन और एनडीए के बीच जबानी जंग, आरोप-प्रत्यारोप के खूब बाण चले। वहीं जनता संबोधन में एक दूसरे पर पार्टियों के नेताओं ने निजी टिप्पणियां भी जोरों शोरों से की। इन सब के बाद चुनाव के परिणाम आने पर एनडीए 123 सीट जबकि विपक्षी महागठबंधन ने 110 सीट व अन्य 10 सिटे मिली। इसके बाद विपक्षी पार्टियों द्वारा चुनाव और उसके परिणामों को लेकर खूब सवाल उठाए गए।

    सरकार और किसान आंदोलन

    सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानून
    • किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य संवर्धन एवं सुविधा) विधेयक: जिसके अंतर्गत विभिन्न राज्य विधानसभाओं द्वारा गठित कृषि उपज विपणन समितियां (एपीएमसी) द्वारा विनियमित मंडियों के बाहर कृषि उपज की बिक्री की अनुमति देगा है।

    किसान (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) मूल्य आश्वासन अनुबंध एवं कृषि सेवाएं विधेयक: इस कानून का उद्देश्य अनुबंध खेती यानी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की इजाजत देना है

    आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक: इस कानून के अनुसार अनाज व खाद पदार्थों के उत्पादन, आपूर्ति, वितरण को विनियमित करेगा। अर्थात अनाज, खाद पदार्थ आवश्यक वस्तु की सूची से बाहर करने का प्रावधान बनाए गए हैं।

    लेकिन इन तीनों कानूनों में से कोई भी कानून किसानों को स्वीकार नहीं है। कृषि कानूनों को लेकर किसानों का जोर शोर से आंदोलन चल रहा है जिससे सियासत काफी गर्म है। जहां सरकार कृषि कानूनों को वापस नहीं ले रही वहीं विपक्ष और किसानों में कृषि कानून और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल लिया है। बता दें कि पंजाब हरियाणा व अन्य जगहों से किसान जन यात्रा करते हुए दिल्ली तक पहुंच कर सरकार के बनाए कृषि कानूनों का खुलकर विरोध कर रहे हैं। कानून के खिलाफ किसानों का कहना है कि यह कानून उनके लिए किसी भी रूप से हितकारी नहीं है। इन कानूनों से किसानों को नुकसान और निजी खरीदारों व बड़े कॉरपोरेट घरानों को सिर्फ फायदा होगा। साथ ही साथ किसानों को फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) खत्म हो जाने का भी डर सता रहा है. किसानों का यह भी कहना है कि फसल या खाद पदार्थों की कीमत तय करने पर हुए विवादों का निजी कंपनियां फायदा उठाने की कोशिश करेंगे। उपज जमा करने के लिए निजी निवेश को छूट होगी जिससे कहीं ना कहीं छोटे किसानों को समझौता करना पड़ेगा।
    हाल फिलहाल अभी भी सरकार और किसानों के बीच समझौता नहीं हुआ है जिससे अभी भी मतभेद की स्थिति बनी हुई है।

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